Kab bulaoge desh

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St Therese’s expression for Jesus- “After exile on earth I hope to enjoy the possession of Thee in our eternal Fatherland..”  –  (ending quotation of the previous post) brings to my mind a poignant piece, dedicated to Lord Krishna by Swami Shri Mukund Hari ji Maharaj-

साजन! कब बुलाओगे देश?
विरही करके भेज दिया प्रिय!
कब संयोग का दान मिलेगा?
बोलो… परम स्नेही बोलो…
कब कैसे आह्वान मिलेगा?
जो चाहो सो कर लो प्रियतम,
पर अब तो छीनो दिया विदेश।
साजन! कब बुलाओगे देश?

तुम बिन जीवन सूना नीरस..
मन प्राणों के तार हैं गौण!
मधुर जगत के मधु कलाप-सब,
अब तो प्रणयेश! गहे है मौन!
कब इस रीतेपन से मुक्त हो
पाऊं प्रियतम का परिवेश।
साजन! कब बुलाओगे देश?

कब साजन के देश विरहणी
पी स्वर सुन पाएगी?
कब वियुक्ता हो प्रिय संयुक्ता
प्रीतम के गुण गाएगी?
मेरे मधुरातिमधुर! कहो…
कब पाऊंगी मंगल संदेश।
साजन! कब बुलाओगे देश?